हर प्रकार की
प्रशंसा और स्तुति अल्लाह के लिए योग्य है।
बुखारी (हदीस
संख्या :2736) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 2677) ने अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से
रिवायत किया है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया :
"अल्लाह तआला के निन्यानबे, सौ में एक कम नाम हैं, जिसने इन्हें सीखा (इनके
अनुसार अमल किया) वह स्वर्ग (जन्नत) में प्रवेश करेगा।"
कुछ विद्वानों
(जैसे इब्ने हज़्म रहिमहुल्लाह) ने इस हदीस से यह अर्थ समझा है कि अल्लाह तआला के
नाम इस संख्या में सीमित हैं। (देखिये : अल-मुहल्ला 1/52)
इब्ने हज़्म
रहिमहुल्लाह ने जो यह बात कही है विद्वानों की बहुमत ने इस का समर्थन नहीं किया
है, बल्कि कुछ विद्वानों (जैसे नववी) ने उल्लेख किया है कि विद्वान इस बात पर सहमत
हैं कि अल्लाह तआला के नाम इसी संख्या में सीमित नहीं हैं। गोया उन्हों ने इब्ने
हज़्म के कथन को विचलित (नियमविरुद्ध) समझा है जिसकी ओर ध्यान नहीं दिया जायेगा।
अल्लाह तआला के
सुंदर नामों के इस संख्या में सीमित न होने पर उन्हों ने इस हदीस के द्वारा तर्क
स्थापित किया है जिसे अमाम अहमद (हदीस संख्या : 3704) ने अब्दुल्लाह बिन मसऊद
रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा कि अल्लाह के पैग़ंबर
सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जो आदमी भी संकट और दुख से ग्रस्त हो,
और यह दुआ पढ़े :
अल्लाहुम्मा इन्नी
अब्दुका, वब्नो अब्दिक, वब्नो अम-तिक, नासियती बि-यदिक, माज़िन फिय्या हुक्मुक,
अद्लुन फिय्या क़ज़ाउक, अस्-अलुका बि-कुल्लिसमिन हुवा लक, सम्मैता बिहि नफ्सक, औ
अल्लम्तहु अह-दन मिन खल्क़िक, औ अन्ज़ल्तहु फी किताबिक, अविस्ता´सर्ता बिहि फी इल्मिल ग़ैबे इन्दक, अन् तज्अ़लल क़ुर्आना रबीआ़ क़ल्बी, व जलाआ
हुज़्नी, व ज़हाबा हम्मी"
(ऐ अल्लाह! मैं
तेरा दास, तेरे दास का बेटा हूँ, तेरी दासी का बेटा हूँ, मेरी पेशानी तेरे हाथ में
है, मेरे ऊपर तेरा आदेश चलता है, मेरे बारे में तेरा फैसला न्यायपूर्ण है। ऐ
अल्लाह मैं तुझ से तेरे हर उस नाम के द्वारा प्रश्न करता हूँ जिस से तू ने अपने आप
को नामित किया है, या तू ने उसे अपनी मख्लूक़ में से किसी को सिखाया है, या तू ने
उसे अपनी किताब में उतारा है, या उसे अपने पास प्रोक्ष ज्ञान में सुरक्षित रखा है,
कि तू क़ुर्आन को मेरे दिल की बहार, मेरे सीने की रोशनी, मेरे संकट का मोचन और मेरी
चिन्ता और दुख का निवारण बना दे।)
तो अल्लाह तआला
उसके दुख और संकट को समाप्त कर देगा और उसे खुशी से बदल देगा।" कहा गया : ऐ
अल्लाह के पैग़ंबर क्या हम इसे सीख न लें ? आप ने फरमाया : "क्यों नहीं, जो भी
इसे सुने उसके लिए उचित है कि वह इसे सीख ले।"
(अल्बानी ने अस्सिलसिला अस्सहीहा हदीस
संख्या: 199 में सहीह कहा है।)
नबी सल्लल्लाहु
अलैहि व सल्लम का फरमान : "या तू ने उसे अपने पास प्रोक्ष ज्ञान में सुरक्षित
रखा है।"
इस बात का प्रमाण है कि अल्लाह तआला के कुछ सुंदर नाम ऐसे हैं जिन्हें उस ने
अपने पास प्रोक्ष ज्ञान में सुरक्षित कर रखा, जिन से अपनी मख्लूक़ में से किसी को
सूचित नहीं किया है, यह इस बात को इंगित करता है वे निन्यानबे से अधिक हैं।
शैखुल इस्लाम
(इब्ने तैमिय्या) "मजमूउल फतावा" (6/374) में इस हदीस के बारे में फरमाते हैं :
"यह इस बात
को इंगित करती है कि अल्लाह के नाम निन्यानबे से अधिक हैं।"
तथा उन्हों ने यह
भी कहा है कि :
"खत्ताबी
वग़ैरा ने कहा है कि : इस हदीस से पता चलता है कि अल्लाह तआला के कुछ ऐसे नाम हैं
जिन्हें उस ने अपने पास सुरक्षित रखा है, और उस हदीस से पता चलता है कि आप
सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान : "अल्लाह तआला के निन्यानबे नाम हैं,
जिसने इन्हें सीखा (इनके अनुसार अमल किया) वह स्वर्ग (जन्नत) में प्रवेश
करेगा।"
का अर्थ यह है कि उसके नामों में से निन्यानबे नाम ऐसे हैं कि जिस ने उन्हें
सीखा और उनके अनुसार अमल किया वह स्वर्ग में प्रवेश करेगा। जैसे कि कहने वाला कहता
है : मेरे पास एक हज़ार दिर्हम हैं जिन्हें मैं ने दान करने के लिए तैयार किया है,
भले ही उस का धन इस से अधिक हो। और अल्ला तआला ने क़ुरआन में फरमाया है : "और
अच्छे अच्छे नाम अल्लाह ही के लिए हैं, अत: उन्ही नामों से उसे पुकारो (नामांकित
करो)।" (सूरतुल-आराफ़: 180) चुनाँचि अल्लाह तआला ने सामान्य रूप से अपने अच्छे
नामों के द्वारा पुकारने का आदेश दिया है, और यह नहीं कहा है कि : उसके अच्छे नाम
निन्यानबे ही हैं। (मजमूउल फतावा 22/482)
तथा नववी
रहिमहुल्लाह ने सहीह मुस्लिम की शरह में इस पर विद्वानों की सर्वसम्मति का उल्लेख
किया है, वह कहते हैं :
"विद्वानों
की इस बात पर सर्वसम्मति है कि इस हदीस में अल्लाह सुब्हानहु व तआला के नामों को
सीमित नहीं किया गया है, इस हदीस का यह अर्थ नहीं है कि इन निन्यानबे नामों के
अलावा उस के और नाम नहीं हैं, बल्कि इस हदीस का अभिप्राय यह है कि ये निन्यानबे
नाम ऐसे हैं कि जिसने इन्हें सीख कर इनके अनुसार अमल किया वह स्वर्ग में प्रवेश
करेगा, अत: इस का मतलब इन पर अमल करने पर स्वर्ग में प्रवेश करने की सूचना देना
है, (अल्लाह के) नामों के सीमित होने की सूचना देना नहीं है।
तथा शैख इब्ने
उसैमीन रहिमहुल्लाह से इस के विषय में प्रश्न किया गया तो उन्हों उत्तर दिया :
"अल्लाह तआला
के नाम किसी निश्चित संख्या में सीमित नहीं हैं, इस का प्रमाण आप सल्लल्लाहु अलैहि
व सल्लम का सहीह हदीस में या फरमान है : "ऐ अल्लाह! मैं तेरा दास हूँ, तेरे
दास का बेटा हूँ, तेरी दासी का बेटा हूँ, मेरी पेशानी तेरे हाथ में है, मेरे ऊपर
तेरा आदेश चलता है, मेरे बारे में तेरा फैसला न्यायपूर्ण है। ऐ अल्लाह मैं तुझ से
तेरे हर उस नाम के द्वारा प्रश्न करता हूँ जिस से तू ने अपने आप को नामित किया है,
या तू ने उसे अपनी मख्लूक़ में से किसी को सिखाया है, या तू ने उसे अपनी किताब में
उतारा है, या उसे अपने पास प्रोक्ष ज्ञान में सुरक्षित रखा है।"
और जिस चीज़ को
अल्लाह तआला अपने प्रोक्ष ज्ञान में सुरक्षित कर रखा है उस के बारे में जानना संभव
नहीं है, और जो चीज़ ज्ञान ही में न हो वह सीमित नहीं हो सकती।
जहाँ तक नबी
सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के फरमान : "अल्लाह तआला के निन्यानबे, सौ में एक
कम नाम हैं, जिसने इन्हें सीखा (इनके अनुसार अमल किया) वह स्वर्ग (जन्नत) में
प्रवेश करेगा।" का संबंध है तो इस का अर्थ यह नहीं है कि उस के केवल यही नाम
हैं, बल्कि इस का अर्थ यह है कि जिस ने उस के नामों में से इन निन्यानबे नामों को
सीख कर उन पर अमल किया वह स्वर्ग में जायेगा, चुनाँचि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम
के फरमान का यह वाक्य "जिस ने उन पर अमल किया", पहले वाक्य का पूरक है, अलग से एक नया वाक्य नहीं है। और इसी के समान अरब का
यह कहना है : मेरे पास सौ घोड़े हैं जिन्हें मैं ने अल्लाह के रास्ते में जिहाद के
लिए तैयार किया है। इस का यह अर्थ नहीं है कि उस के पास केवल यही सौ घोड़े हैं ;
बल्कि ये सौ घोड़े इस उद्देश्य के लिए तैयार किये गये हैं।"
(मजमूअ़ फतावा इब्ने उसैमीन 1/122)